मैँ अकली इस सुनशान जगह पर

मैँ अकली इस सुनशान जगह पर ,
मेरी चुप तोङने कोई नहीँ आता ,
बारिश के मौसम मेँ किसानो को मेरा चुप रहना बहुत भाता ,
जब पङती तेज धूप तो सर तो सर छुपाने मेरे पास आता ,
महल तो बहुत दूर रहता हैँ जब गाय चरने कोई जाता ,
मैँ हूँ शदियो पुरानी मुझको सब भाता ,
अब जमाना अलग हैँ मेरे को कौई नहीँ चाहता,
मै हूँ राजस्थानी संस्कृति का प्रतिक अब मुझे रोना आता॥

2 comments:

  1. मर्मस्पर्शी ...वक़्त वक़्त की बात है ....तब जैसा आज नहीं ..

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